July 1, 2022
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पंचायतकर्मियों के हड़ताल को गंभीरता से क्यों नहीं लेती सरकारें, दुर्भाग्य हैं इन्हें ही दोषी करार देने की परंपरा चल पड़ी है

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जिया न्यूज़:-दिनेश गुप्ता/चन्दन-दंतेवाड़ा,

दंतेवाड़ा-प्रश्न उठता है कि आखिर पंचायत विभाग के सबसे छोटे गैर-सरकारी सेवक हड़ताल पर क्यों बैठ जाते हैं ?और इनके हड़ताल को सरकारें गंभीरता से क्यों नहीं लेती ।हड़ताल चतुर्थ वर्ग की भी होती रही हैं, शिक्षकों की भी और बाबुओं की भी होती रहती हैं लेकिन केवल इन कर्मियों के हड़ताल को महत्व नहीं मिलना क्या साबित करता है ।इस प्रश्न का जवाब बुद्धिजीवियों को तलाशना होगा ।सामान्य मान्यता है कि कुछ पंचायतकर्मी सेवा करते अकूत सम्पति के मालिक कैसे हो गए ?इसका जवाब दूसरे उदाहरण से समझा जा सकता है ।कई चतुर्थ वर्ग कर्मी, शिक्षक, बाबूवर्ग के लोग भी सम्पति बना रखें हैं ।अपने मूल पेशे के अलावा दीगर कार्यों से भी धन कमाई जा सकती है ।कई शिक्षक ठेकेदार हो गए है उनपर कोई कुछ नहीं बोलता ।इन पंचायतकर्मियों को तो जबरन 28-30 विभागों का काम करना होता है और गैर तकनीकी होते हुए भी तकनीकी कार्यों को करना होता हैं ।पंचायत के इन कर्मियों को समयसीमा मिलती है और मिलती रहती है कारण बताओ नोटिस ।इन सब के परे सरकारें बदलती है ।

प्रशासन में व्यापक फेरबदल होते हैं लेकिन नहीं बदलते हैं तो बाबू ।किसी भी सरकार ने इन बाबुओं पर फेरबदल की कार्यवाही नहीं की ।बुद्धिजीवी वर्ग अक्सर इन बाबुओं पर चिंता जाहिर करते रहते हैं।यूं तो सरकारें पंचायतों को मजबूत बनाने के लिए अनेक योजनाएं लाती हैं इन योजनाओं को मूर्तरुप देने वाले ये कर्मी ही जब गैरसरकारी होंगे ,असुरक्षित होंगे तो क्या कार्यों के प्रति उत्साह होगा ?कुलमिलाकर इन कर्मियों का दुर्भाग्य रहा है कि इन्हें शो-काज नोटिस, निलंबन, सेवामुक्त होने का खतरा बना रहता है ।शेष होनहार बच निकलते है ।बलि का बकरा इन्हें बना दिया जाता है ।परिस्थिति ऐसी निर्मित हो जाती है कि जांच किये बगैर ये दोषी साबित हो जाते हैं ।मीडिया,प्रशासन, और सरकार से राहत के बजाय आहत होते हैं ।बहरहाल, चुनाव के पहले इन कर्मियों को झुनझुना पकड़ा दिया जाएगा ।सरकारें अचानक इनके प्रति चिंतित होने का स्वांग करने लगेगी और फिर निकल पड़ेंगे ये मुलाजिम अपने सपने लिए दौड़ में ।दौड़ ऐसी होगी जिसकी दूरी अगले चुनाव तक होगी ।इनके आंदोलन में एक बात यह भी महसूस किया गया है कि पूरी शिद्दत से मैदान में शक्ति दिखा पाने में ये चूक करते रहे हैं अन्यथा पंचायत की रीढ़ हैं ये ।सबसे पहले इनकी मांग को पूरा किया जाना सरकार के लिए आवश्यक होता ।देखना होगा इस बार के आंदोलन का पटाक्षेप किस तरह से होता है ।

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