September 28, 2021
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अंगद की तरह जमे हुए हैं। बाबू…हालात बेकाबू बड़े बाबू तो बड़े बाबू छोटे बाबू शुभानअल्लाह

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जिया न्यूज़:-दिनेश/चन्दन,

दंतेवाड़ा-बाबूओं के विषय में बुद्धिजीवियों की चिंता स्वाभाविक है जिले में ही नहीं संभाग में इनकी तूती बोलती है ।अधिकारी, फील्ड अधिकारी यहां तक की चतुर्थ कर्मी भी इधर से उधर होते हैं लेकिन ये बाबू ही होते हैं जो जमे रहते हैं ।जिले में लगभग सभी विभागों में कहानी एक जैसी हैं ।सरकारें बदलती रही ,अधिकारी बदलते रहे लेकिन नहीं बदलते तो ये गैर तकनीकी कर्मी।जिला कलेक्टर कार्यालय, स्वास्थ्य ,उद्यान, लोकनिर्माण, ग्रामीण यांत्रिकीय, शिक्षा, सिंचाई आदि सहित सभी विभागों में बाबू वर्षों से जमे हुए हैं ।इनका तबादला आखिर क्यों नहीं होता ।कुछ तो ऐसे भी हैं जो ऐसे जमे की सेवानिवृत्त के बाद भी नहीं हिले ।सारा मामला खुद के लिए फिट कर रखा था।आफिस में तो सारा मामला फिट करने में ये मुख्य भूमिका में होते ही हैं ।कोई भी वारे-न्यारे इनके बिना नहीं हो सकते,लेकिन जब कभी जांच होती हैं तो ये बेदाग साबित होते हैं ।सारा दाग अधिकारी,फील्ड अधिकारी,ठेकेदार सहित अन्य पर लगते हैं ।ये गैर तकनीकी होते हैं आहरण का अधिकार इन्हें नहीं होता ।ये बच निकलते हैं ।ये तो नारद की भूमिका अदा करते हैं ।आम चर्चा होती है कि प्रशासन को दुरुस्त करने के लिए इन वर्ग के कर्मियों का भी तबादला होना चाहिए लेकिन ऐसा क्यों नहीं होता यह भी सवाल है ।एक ही जगह पर जमे होने से प्रशासन में नयापन नहीं दिखता ।बदलाव से नीरसता खत्म होती है ।प्रकृति भी मौसम के रूप में बदलाव करती रहती है ।अधिकारी वर्ग,फील्ड कर्मी सहित आमजनता भी मानती है कि इन कर्मियों पर व्यापक फेरबदल किया जाना चाहिए ताकि प्रशासनिक कसावट आ सके ।सरकार चाहे तो सर्वे करा ले ।बाबूवर्ग की इतनी पैठ है कि तबादले से आये अधिकारी इनके मनमाफिक चलने को मजबूर होते हैं कई जगह तो स्थिति ऐसी भी होती है कि। मनमाफिक अधिकारी नहीं होने से अधिकारी का ही तबादला हो जाता हैं ।छोटे पद और मामूली तनख्वाह वाले इन कर्मियों के ठाठ के क्या कहने ?खैर, सनद रहे वक़्त जरूरत पर काम आवे ।

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