January 22, 2022
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सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की अवहेलना करते हुए पैथोलॉजी लैब संचालित

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जिया न्यूज़:-सुभाष यादव-दंतेवाड़ा,

दंतेवाड़ा:- आप किसी पैथोलॉजी में टेस्ट इसलिए करवाते हैं क्योंकि उसकी रिपोर्ट पर आपका भरोसा होता है और उसी रिपोर्ट के आधार पर आपका इलाज होता है। लेकिन अगर टेस्ट में कोताही बरती जाए तो आपकी रिपोर्ट गड़बड़ भी हो सकती और आपका इलाज भी।
दंतेवाड़ा नगरीय क्षेत्रों में मण्डल पैथोलॉजी लैब, संजीवनी लैब, खुलेआम मानकों की अनदेखी करते हुए संचालित है। यह लैब खुलेआम मानकों की अनदेखी कर रहे हैं। स्थिति ये कि इनमें मिनिमम स्टेंडर्ड तक का पालन नहीं किया जा रहा है। स्पष्ट निर्देश हैं कि बिना विशेषज्ञ डॉक्टरों के पैथोलॉजी जांच केंद्र नहीं चलेंगे। इन पैथोलॉजी लैबो में अयोग्य व्यक्ति, बिना डिग्री धारी लोगों द्वारा जाँच किया जा रहा है।

मण्डल पैथोलॉजी लैब दंतेवाड़ा में विगत 14 वर्षों से संचालित है,जिला प्रशासन द्वारा मानकों के अनदेखी की वजह से पूर्व में अनुविभागीय अधिकारी द्वारा लैब को शील किया गया था। लैब संचालक शील लैब को तोड़कर सामग्रियों को वर्तमान में संचालित लैब में स्थानांतरित कर लैब का संचालन आज भी कर रहा है। आश्चर्य की बात शासन द्वारा शील पैथोलॉजी लैब को बेखौफ होकर तोड़ना और शासन की आदेशों की अवहेलना करना इन पैथोलॉजी लैब संचालको के लिए आम बात हो गई है। इन पैथोलॉजी लैब व क्लीनिक संचालकों को कानून का डर ही नही हैं। इसकी वजह प्रशासनिक अधिकारियों का अपने कर्तव्यों के प्रति उदासीन रवैया इसका बड़ा कारण हैं।

कोई भी पैथोलॉजी लैब बिना एमडी पैथोलॉजिस्ट या डीसीपी (डिप्लोमा इन क्लीनिकल पैथोलॉजी ) के बिना नहीं खुल सकेगी। सुप्रीम कोर्ट ने एक दर्जन से अधिक याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए यह फैसला दिया है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुसार ऐसा भी संभव नहीं होगा कि किसी पोस्ट ग्रेजुएट पैथोलॉजिस्ट के नाम पर कोई लैब खोल ले, पैथोलॉजिस्ट का मौके पर होना जरूरी होगा। इस आदेश से अफसरों पर झोलाछापों की लैबों पर कार्रवाई के लिए दबाव बढ़ेगा।

सुप्रीम कोर्ट के आदेश: सुप्रीम कोर्ट की दो सदस्यों की खंडपीठ (न्यायाधीश राजन गोगोई व आर बानुमूर्ति) ने एक दर्जन से अधिक याचिकाओं पर सुनवाई के बाद 12 दिसम्बर 2017 को अपने फैसले में लैब रिपोर्ट एमडी पैथोलॉजिस्ट के नाम पर लैब तकनीशियन या अयोग्य व्यक्तियों द्वारा चलाया जा रही लैबो को गैरकानूनी घोषित कर दिया गया हैं। सुप्रीम कोर्ट का फैसला मरीजो के हित मे स्वागतयोग्य हैं, किसी के जीवन से खेलने का अधिकार किसी को नही हैं।

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